अगर आपकी पूरी कमाई एक ही बैंक अकाउंट में आती है और वहीं से EMI, बिल, शॉपिंग, सेविंग्स का पैसा और रोजमर्रा के खर्च होता है, तो महीने के आखिर तक में यह समझना मुश्किल हो सकता है कि कितना पैसा खर्च करना है और कितना सुरक्षित रखना है. ऐसे में पैसों को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से अलग खातों में रखना एक बेहतर वित्तीय आदत हो सकती है.
दरअसल, अलग-अलग बैंक अकाउंट रखने से आपके जरूरी खर्च, रोजमर्रा की जरूरत और इमरजेंसी फंड अलग रहते हैं. इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि एक तरफ बजट पर नजर रखना आसान होता है. वहीं दूसरी तरफ अचानक जरूरत पड़ने पर सेविंग्स को खर्च करने से भी बचाया जा सकता है. आइए जानते हैं कि अलग-अलग काम के लिए बैंक अकाउंट कैसे इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
क्यों जरूरी है अलग-अलग बैंक अकाउंट रखना?
अक्सर एक ही खाते में पूरी सैलरी रखने पर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कितना पैसा खर्च करना है और कितना बचाना है. यही वजह ही कि आप अपने जरूरत के हिसाब से अलग खाते रख सकते हैं.
- सैलरी अकाउंट: इस अकाउंट में आपकी सैलरी आए और यहीं से किराया, EMI, बिजली-पानी जैसे जरूरी खर्चों का पेमेंट किया जा सकता है. इससे हर महीने के फिक्स्ड खर्चों का हिसाब रखना आसान रहता है.
- स्पेंडिंग अकाउंट: महीने के मनोरंजन, बाहर खाने, शॉपिंग और दूसरे गैर-जरूरी खर्चों के लिए एक अलग अकाउंट रखें. इसमें पहले से एक तय रकम डालें और उसी लिमिट में पूरे महीने खर्च करें.
- इमरजेंसी फंड अकाउंट: अचानक आने वाले जरूरी खर्चों के लिए अलग फंड बनाएं. इसे रोजमर्रा के खर्च वाले खाते से अलग रखना बेहतर है.
इमरजेंसी फंड में कितनी रकम रखें?
आम तौर पर 3 से 6 महीने के जरूरी खर्च के बराबर रकम का इमरजेंसी फंड रखने की सलाह दी जाती है. अगर आपकी नौकरी या कमाई स्थिर नहीं है, तो इससे ज्यादा रकम रखना भी फायदेमंद हो सकती है. वहीं, परिवार की जिम्मेदारियां और कर्ज बढ़ने पर इमरजेंसी फंड की जरूरत भी बढ़ सकती है.
इमरजेंसी फंड का पैसा कहां रखें?
इमरजेंसी फंड का खास मकसद जरूरत पड़ने पर तुरंत पैसा उपलब्ध कराना है. इसलिए पूरी रकम को एक ही जगह रखने के बजाय ऐसी जगह पर रखें, जहां पैसे निकालने में ज्यादा समय या भारी चार्ज न लगे. कुछ रकम सेविंग अकाउंट में रखें और कुछ पैसा ऐसी FD में रखा जा सकता है, जहां जरूरत पड़ने पर रकम निकालने की सुविधा हो.
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