10 अक्टूबर 2026, 5:14 PM
हर खबर, हर पल
हमारे बारे मेंसंपर्क
मनोरंजन

10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि नहीं मालूम, उनका श्राद्ध कैसे करें?

Sarva Pitru Amavasya 2026: दादा-परदादा की मृत्यु तिथि याद नहीं है या इस पितृ पक्ष में किसी अपने का श्राद्ध छूट गया है? सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है. जानिए संकल्प कैसे लें और घर पर किन बातों का ध्यान रखें.

10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि नहीं मालूम, उनका श्राद्ध कैसे करें?
स्रोत: ABP NEWS ASTRO
शेयर करेंWhatsAppFacebook

Sarva Pitru Amavasya 2026: दादा-परदादा की मृत्यु तिथि याद नहीं है या इस पितृ पक्ष में किसी अपने का श्राद्ध छूट गया है? सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है. जानिए संकल्प कैसे लें और घर पर किन बातों का ध्यान रखें.

घर में पुरानी तस्वीरें हैं. दादा-दादी के किस्से भी याद हैं. लेकिन उनसे पहले की पीढ़ियों में किसका निधन किस तिथि पर हुआ था, यह बताने वाला अब कोई नहीं है. कई परिवारों में मृत्यु की अंग्रेजी तारीख लिखी मिलती है, हिंदू पंचांग की तिथि नहीं.

ऐसे में पितृ पक्ष आते ही सवाल उठता है, जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि नहीं मालूम, उनका श्राद्ध किस दिन करें?

इसका उत्तर है सर्वपितृ अमावस्या. वर्ष 2026 में यह 10 अक्टूबर, शनिवार को है. पितृ पक्ष के इस अंतिम दिन उन दिवंगत पूर्वजों के निमित्त भी श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि अज्ञात हो या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो.

मृत्यु की तारीख और श्राद्ध की तिथि में क्या अंतर है?

श्राद्ध का दिन तय करते समय अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख और हिंदू पंचांग की तिथि का अंतर समझना जरूरी है. उदाहरण के लिए, किसी का निधन 15 अक्टूबर को हुआ था तो हर वर्ष 15 अक्टूबर को ही उसका तिथि-श्राद्ध हो, यह जरूरी नहीं. इसके लिए निधन के समय की चंद्र तिथि देखी जाती है.

यदि मृत्यु की तारीख, वर्ष और स्थान उपलब्ध हैं, तो पंचांग के जानकार से संबंधित तिथि निकलवाई जा सकती है. समय भी मालूम हो तो तिथि बदलने की स्थिति में निर्णय अधिक स्पष्ट होता है. लेकिन पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध न हो तो अनुमान से कोई तिथि तय करने की जरूरत नहीं. पितृ पक्ष में ऐसे पूर्वजों को याद करने के लिए सर्वपितृ अमावस्या की परंपरा है.

नाम या गोत्र भी याद न हो तो संकल्प कैसे लें?

बहुत पुरानी पीढ़ियों के सभी नाम याद होना संभव नहीं. सर्वपितृ अमावस्या का भाव ही अपने ज्ञात और अज्ञात दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करना है. जिनके नाम और संबंध मालूम हैं, उनका उल्लेख करें. बाकी पूर्वजों के लिए सामूहिक रूप से प्रार्थना कर सकते हैं.

सरल हिंदी में अपनी भावना इस तरह व्यक्त की जा सकती है- मैं अपने पितृ और मातृ पक्ष के उन सभी दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करता/करती हूं, जिनके नाम मुझे ज्ञात हैं और जिनके नाम या मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हैं. उनके निमित्त यह जल और अन्न अर्पित करता/करती हूं.

यह भाव व्यक्त करने का उदाहरण है, विधिवत संस्कृत संकल्प का विकल्प नहीं. पुरोहित से श्राद्ध करा रहे हों तो उन्हें पहले बता दें कि किन पूर्वजों की तिथि, नाम या गोत्र की जानकारी उपलब्ध नहीं है. कोई विवरण अपनी ओर से गढ़कर न बताएं.

घर पर तर्पण कैसे करें?

प्रचलित पितृ-तर्पण विधि में स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर दक्षिण दिशा की ओर मुख किया जाता है. स्वच्छ जल, काले तिल और कुश का प्रयोग होता है. पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है. हालांकि मंत्र, जल अर्पण का क्रम और अन्य नियम परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं. पहली बार कर रहे हों तो किसी जानकार से विधि समझ लें.

यहां एक अंतर समझना जरूरी है. तर्पण में जल अर्पित किया जाता है, जबकि विधिवत श्राद्ध में संकल्प, पिंडदान, भोजन और अन्य कर्म परंपरा के अनुसार शामिल हो सकते हैं. इसलिए केवल तिल मिला जल अर्पित करने को हर स्थिति में पूरा श्राद्ध बताना सही नहीं होगा.

श्राद्ध का समय कैसे चुनें?

श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल का महत्व बताया जाता है. इनके समय शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त के अनुसार बदलते हैं. इसलिए दिल्ली का मुहूर्त पूरे देश के लिए लागू न मानें. 10 अक्टूबर को अपने शहर के पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार समय चुनें.

सुबह स्नान और आवश्यक तैयारी कर सकते हैं. भोजन, सामग्री और पुरोहित की व्यवस्था पहले कर लेने से निर्धारित समय पर कर्म पूरा करना आसान होगा.

भोजन और दान में क्या रखें?

परिवार की परंपरा के अनुसार सात्त्विक भोजन तैयार किया जाता है. कई घरों में खीर, पूड़ी, चावल और दाल बनती है. प्याज-लहसुन से परहेज किया जाता है. भोजन में गाय, कौए और कुत्ते के लिए अंश निकालने की परंपरा भी मिलती है.

विधिवत श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा की व्यवस्था अपने कुलाचार के अनुसार करें. पूर्वजों की स्मृति में जरूरतमंदों को भोजन या अन्न देना भी कर सकते हैं. लेकिन सामान्य दान और श्राद्ध के निर्धारित कर्मों को एक ही चीज न समझें.

इस पितृ पक्ष में श्राद्ध छूट गया है तो?

किसी पूर्वज की तिथि मालूम होने के बावजूद बीमारी, यात्रा या दूसरी मजबूरी से श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है. इसका अर्थ यह नहीं कि आगे से ज्ञात मृत्यु तिथि की उपेक्षा कर दी जाए.

जिन परिवारों के पास पुराने रिकॉर्ड नहीं हैं, उनके लिए 10 अक्टूबर अपने दिवंगत पूर्वजों को सामूहिक रूप से याद करने का अवसर है. उपलब्ध जानकारी के साथ संकल्प लें, परिवार की विधि का पालन करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए नाम, संबंध तथा मृत्यु तिथि का रिकॉर्ड संभालकर रखें.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

समाचार स्रोत

यह खबर ABP NEWS ASTRO से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

मूल स्रोत देखें ↗