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Explained: क्या आइजनकोट के इजराइली PM बनने से फ़िलिस्तीन के साथ जंग रुक जाएगी? जानिए उनका स्टैंड

इजराइल की राजनीति में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और चुनावों के बीच गादी आइजनकोट का नाम सबसे बड़े और चर्चित चेहरों में से एक बनकर उभरा है. इज़राइली सेना (IDF) के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ और 'यशार' पार्टी क

Explained: क्या आइजनकोट के इजराइली PM बनने से फ़िलिस्तीन के साथ जंग रुक जाएगी? जानिए उनका स्टैंड
स्रोत: abp news world
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इजराइल की राजनीति में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और चुनावों के बीच गादी आइजनकोट का नाम सबसे बड़े और चर्चित चेहरों में से एक बनकर उभरा है. इज़राइली सेना (IDF) के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ और 'यशार' पार्टी के नेता रहे आइजनकोट बेंजामिन नेतन्याहू के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं.

चूंकि गादी आइजनकोट ने नेतन्याहू के खिलाफ चुनाव में मोर्चा संभाला है, ऐसे में दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि यदि आइजनकोट इज़राइल के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो क्या फ़िलिस्तीन के साथ चल रही जंग रुक जाएगी? और फ़िॉलिस्तीन और वेस्ट बैंक को लेकर उनका रुख असल में क्या है?

आइए इस पूरे विषय को विस्तार से समझते हैं

क्या आइजनकोट के प्रधानमंत्री बनने से फ़िलिस्तीन के साथ जंग रुक जाएगी?

इसका सीधा और स्पष्ट जवाब यह है कि वे तुरंत और पूरी तरह से जंग रोकने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि उनका तरीका और रणनीति नेतन्याहू से अलग जरूर हो सकती है.

गादी आइजनकोट खुद एक पूर्व सैन्य जनरल रहे हैं और उन्होंने गाजा, लेबनान और ईरान के खिलाफ इज़राइली सैन्य अभियानों का व्यापक रूप से समर्थन किया है. इसलिए यह सोचना भूल होगी कि सत्ता में आते ही वे तुरंत सभी सैन्य कार्रवाइयां बंद कर देंगे.

आइजनकोट का यह दावा रहा है कि वे इज़राइल की सुरक्षा के लिए हमास को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने के पक्ष में हैं. उन्होंने अपने चुनाव अभियानों में यहां तक कहा है कि वे प्रधानमंत्री बनने के बाद इज़राइल की सुरक्षा और बंधकों की वापसी के लिए अपनी रणनीति के तहत सख्त कदम उठाएंगे.

हालांकि वे सैन्य कार्रवाई के समर्थक हैं, लेकिन वे नेतन्याहू की उन नीतियों के आलोचक रहे हैं जिनके कारण बंधकों की रिहाई के समझौते बार-बार अटके. उनका मानना है कि रणनीतिक और कूटनीतिक तरीके से बंधकों को वापस लाना और अमेरिका के साथ मिलकर काम करना प्राथमिकता होनी चाहिए.

फ़िलिस्तीन को लेकर गादी आइजनकोट का क्या है स्टैंड? 

फिलीस्तीन, वेस्ट बैंक और 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-राज्य समाधान) को लेकर आइजनकोट के विचार काफी स्पष्ट और व्यावहारिक रूप से दक्षिण-पंथी और मध्यमार्गी सोच के दायरे में आते हैं. उनके अब तक के बयानों और साक्षात्कारों से उनका स्टैंड इन बिंदुओं पर साफ होता है.

(क) 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-राज्य समाधान) का विरोध

आइजनकोट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा समर्थित 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (यानी एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के निर्माण) का स्पष्ट रूप से विरोध किया है.

उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, ''मैंने कभी भी 'दो लोगों के लिए दो राज्यों' की बात नहीं की है... जो कोई भी 'अब शांति' और दो राज्यों की बात करता है, वह इस संघर्ष को नहीं समझता है.''

वेस्ट बैंक में बस्तियों का समर्थन

वेस्ट बैंक में इज़राइली बस्तियों के विस्तार को लेकर उनका रुख सकारात्मक रहा है. उनका मानना है कि इज़राइल की सुरक्षा जरूरतों के मुताबिक बस्तियों को बनाए रखा जाना चाहिए.

उन्होंने स्पष्ट किया है कि मैं यहूदा और सामरिया [वेस्ट बैंक] में बस्तियों में बहुत विश्वास करता हूं.. बशर्ते वे इज़राइल के सुरक्षा हितों और कानून के नक्शे के बिल्कुल अनुकूल हों.

फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण (PA) और नियंत्रण पर दृष्टिकोण

आइजनकोट का मानना है कि इज़राइल को सीधे तौर पर गाजा या वेस्ट बैंक के लाखों फ़िलिस्तीनियों पर सीधा प्रशासनिक शासन नहीं चलाना चाहिए, क्योंकि यह इज़राइल के अपने हित में नहीं है.

उन्होंने एक चर्चा में कहा था, ''फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण को 2.8 मिलियन फ़िलिस्तीनियों पर शासन करने की अनुमति दी जानी चाहिए. मैं उन पर शासन नहीं करना चाहता.''

साथ ही, वे किसी भी विदेशी सेना (जैसे जॉर्डन या किसी अन्य बाहरी फ़िलिस्तीनी सेना) को जॉर्डन नदी और भूमध्य सागर के बीच तैनात करने के सख्त खिलाफ हैं. उनका कहना है कि उस क्षेत्र में केवल और केवल इज़राइली सेना (IDF) ही एकमात्र सुरक्षा बल होगी.

नेतन्याहू से उनकी नीति किस तरह अलग है?

हालांकि फ़िलिस्तीन और सुरक्षा के मुद्दों पर आइजनकोट कोई बहुत नरम रुख नहीं रखते, फिर भी उन्हें नेतन्याहू के विकल्प के रूप में क्यों देखा जा रहा है? इसके पीछे कुछ मुख्य अंतर हैं

-आइजनकोट इज़राइली समाज में एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाते हैं जो नियमों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करते हैं. युद्ध के बाद इज़राइल की खराब हो चुकी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने का वे वादा करते हैं.

-नेतन्याहू की सरकार पर आरोप लगता रहा है कि वे अपनी सत्ता बचाने के लिए दक्षिणपंथी और अतिवादी मंत्रियों (जैसे इतामार बेन-ग्वीर) के दबाव में काम करते हैं. इसके विपरीत, आइजनकोट एक अनुशासित सैन्य पृष्ठभूमि से आते हैं और वे ऐसे चरमपंथियों की राजनीति के विरोधी माने जाते हैं.

-आइजनकोट का मानना है कि 7 अक्टूबर जैसी खुफिया और सुरक्षा चूकों के लिए राजनेताओं को ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, जबकि नेतन्याहू पर अक्सर ज़िम्मेदारी से बचने के आरोप लगते रहे हैं.

यदि गादी आइजनकोट इज़राइल के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो यह उम्मीद करना गलत होगा कि वे फ़िलिस्तीन के प्रति कोई बहुत उदार नीति अपनाएंगे या तुरंत एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के गठन को मंजूरी दे देंगे. उनका स्टैंड सुरक्षा-प्रधान, इज़राइल की क्षेत्रीय अखंडता और सख्त सैन्य नियंत्रण पर आधारित है.

हां, फर्क यह जरूर आएगा कि उनकी कार्यशैली अधिक अनुशासित, अंतरराष्ट्रीय सहयोग (विशेषकर अमेरिका के साथ) पर आधारित और नेतन्याहू के मुकाबले अधिक पारदर्शी हो सकती है, जिससे गाजा या क्षेत्रीय मोर्चे पर अनियंत्रित टकराव के बजाय एक प्रबंधित और रणनीतिक रुख देखने को मिल सकता है.

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यह खबर abp news world से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

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