3 अक्टूबर 2026, 11:55 AM
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ओवैसी गठबंधन चाहते हैं, सपा-कांग्रेस ‘वोट कटवा’ बता रही:मुस्लिम वोटों में सेंध का डर या सेक्युलर छवि बचाने की कोशिश; अब क्या करेगी AIMIM

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी जून, 2026 से अब तक यूपी में 5 सभाएं कर चुके हैं। बहराइच, बिजनौर, सहारनपुर और मुरादाबाद के बाद 20 सितंबर को कानपुर में रैली की। एक तरफ उनके भाषणों पर तालियां बजीं, तो दूसरी तरफ उनका जमकर विरोध भी शुरू हो गया है। सपा-कांग्रेस उन्हें 'वोट कटवा' और भाजपा की 'बी-टीम' बता रही हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का क

ओवैसी गठबंधन चाहते हैं, सपा-कांग्रेस ‘वोट कटवा’ बता रही:मुस्लिम वोटों में सेंध का डर या सेक्युलर छवि बचाने की कोशिश; अब क्या करेगी AIMIM
स्रोत: Dainik Bhaskar Uttar Pradesh
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AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी जून, 2026 से अब तक यूपी में 5 सभाएं कर चुके हैं। बहराइच, बिजनौर, सहारनपुर और मुरादाबाद के बाद 20 सितंबर को कानपुर में रैली की। एक तरफ उनके भाषणों पर तालियां बजीं, तो दूसरी तरफ उनका जमकर विरोध भी शुरू हो गया है। सपा-कांग्रेस उन्हें 'वोट कटवा' और भाजपा की 'बी-टीम' बता रही हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि ओवैसी के यूपी में चुनाव लड़ने से भाजपा को फायदा होगा। वहीं, सपा विधायक हसन रूमी और पूर्व सपा विधायक इरफान सोलंकी का कहना है- ओवैसी यूपी का राजनीतिक मिजाज समझ ही नहीं पाए हैं। अब सवाल है कि क्या ओवैसी का विरोध सिर्फ राजनीतिक हमला है? या इसके पीछे मुस्लिम वोटों के बिखराव का डर छिपा है? पढ़िए ये रिपोर्ट… कांग्रेस बोली- सिर्फ मुस्लिम वोट से भाजपा को हराना नामुमकिन सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद कहते हैं- विपक्ष का मुख्य लक्ष्य भाजपा को सत्ता से हटाना है। लेकिन, यह काम केवल मुस्लिम वोटों के दम पर नहीं हो सकता। तेलंगाना और यूपी का राजनीतिक माहौल पूरी तरह अलग है। अगर ओवैसी अपनी भाषणबाजी से 4-5 सीटें जीत भी लेते हैं, तो इससे आखिरकार भाजपा की ही सरकार बनेगी। जब भाजपा सरकार में आती है, तो सबसे बड़ा नुकसान मुसलमानों को ही उठाना पड़ता है। सपा का आरोप- ओवैसी को भाजपा से ‘पैकेज’ मिला सपा नेताओं के तेवर भी ओवैसी को लेकर काफी तल्ख हैं। कानपुर कैंट से विधायक हसन रूमी गंभीर आरोप लगाते हैं। वह कहते हैं- जहां भी मुस्लिमों को मजबूत करने की कोशिश होती है, वहां AIMIM को भाजपा का 'पैकेज' देकर उतार दिया जाता है। बिहार और पश्चिम बंगाल में ओवैसी की राजनीति बेनकाब हो चुकी है। बंगाल में बाबरी के नाम पर वोट मांगे और फिर दोबारा नजर नहीं आए। एक्सपर्ट बोले- ओवैसी को लेकर मुस्लिम समाज में भी शक वरिष्ठ पत्रकार और मुस्लिम मामलों के जानकार नावेद शिकोह के मुताबिक, ओवैसी के मैदान में उतरने से मुस्लिम वोटों में बिखराव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने करीब 100 प्रत्याशी उतारे थे। लेकिन, उन्हें महज 0.43% वोट मिले और एक भी सीट हाथ नहीं आई। महाराष्ट्र और बिहार के अनुभवों के बाद अब यूपी का मुस्लिम समाज भी ओवैसी को शक की नजर से देख रहा है। एक बड़ा तबका यह मान रहा है कि वे सिर्फ सपा-कांग्रेस के वोट में सेंध लगाने आए हैं। ओवैसी का पश्चिमी यूपी पर पूरा फोकस 2022 में मिली करारी हार के बाद AIMIM ने इस बार अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी इस बार सिर्फ चुनाव लड़ने के बजाय संगठन मजबूत करने में जुटी है। पार्टी ने जून, 2026 में बहराइच से अपनी चुनावी तैयारियों का शंखनाद किया था। ओवैसी का खास ध्यान पश्चिमी यूपी के मुस्लिम बहुल जिलों सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, रामपुर और अमरोहा पर है। कानपुर रैली में ओवैसी ने राष्ट्रीय लोक दल (RLD) प्रमुख जयंत चौधरी के प्रति नरम रुख दिखाया। हालांकि RLD अभी भाजपा के साथ गठबंधन में है। फिर भी ओवैसी का यह रुख पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरणों को साधने की कोशिश माना जा रहा है। सपा-कांग्रेस ने साथ नहीं लिया तो ओवैसी क्या करेंगे? ओवैसी का साथ छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए आसिम वकार ने कहा- एक तरफ ओवैसी सपा और कांग्रेस को मुसलमानों का दुश्मन बताते हैं। दूसरी तरफ, उन्हीं से हाथ मिलाने की मिन्नतें करते हैं। ये दोनों बातें एक साथ कैसे चल सकती हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ओवैसी की दी गई डेडलाइन का सपा-कांग्रेस पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। ऐसे में ओवैसी के पास 3 रास्ते बचते हैं- छोटे दलों का मोर्चा : वे चंद्रशेखर (आजाद समाज पार्टी), पल्लवी पटेल और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे छोटे क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर मोर्चा बना सकते हैं। बसपा का विकल्प : एक बेहद कमजोर संभावना बसपा के साथ जाने की भी है। हालांकि इसके आसार न के बराबर हैं। एकला चलो : अगर कोई साथ नहीं आया, तो ओवैसी अपने दम पर प्रत्याशी उतारेंगे। सपा बोली- कट्टरता से दूरी, AIMIM का पलटवार- पिछलग्गू नहीं बनेंगे सपा प्रवक्ता मोहम्मद आजम कहते हैं- पार्टी हर तरह की कट्टरता से बराबर दूरी बनाए रखती है। रैलियों के मंच से दिए गए बयानों से गठबंधन नहीं होते, उसके लिए शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत होती है। मंच से की गई बातें सिर्फ बयानबाजी हैं। इस पर AIMIM प्रवक्ता शादाब चौहान का कहना है कि हम सीटों की भीख नहीं मांग रहे। हम सम्मान और हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं। बिहार में कांग्रेस और RJD को घमंड था। हमने 6 सीटें मांगी थीं, उन्होंने नहीं दीं। हमने 5 सीटें जीतकर दिखाईं। यूपी में भी अखिलेश यादव के अहंकार के कारण बातचीत नहीं हो पा रही। हमारी लड़ाई भाजपा से है, लेकिन हम अपने वजूद की कीमत पर किसी का पिछलग्गू नहीं बनेंगे। ओवैसी के हर कदम पर सपा-कांग्रेस की नजर वरिष्ठ पत्रकार नावेद शिकोह के मुताबिक, ओवैसी की रैलियों में भीड़ जुटना एक बात है, लेकिन उस भीड़ का वोट में बदलना दूसरी बात। यूपी का मुस्लिम मतदाता अब बहुत सतर्क हो चुका है। उसे पता है कि राज्य में सीधा मुकाबला सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा के बीच होना है। अगर ओवैसी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारते हैं, तो वे जीत भले न पाएं, लेकिन 2,000 से 5,000 वोट काटकर 20 से 25 सीटों पर सपा-कांग्रेस का खेल जरूर बिगाड़ सकते हैं। यही वजह है कि ओवैसी के हर कदम पर सपा और कांग्रेस की पैनी नजर बनी हुई है। -------------------------- यह खबर भी पढ़ें- कांग्रेस का वादा- सत्ता में आए तो OBC एक्ट लाएंगे, SC-ST एक्ट की तरह होगा; यूपी चुनाव में क्या सपा साथ देगी कांग्रेस 2027 यूपी विधानसभा चुनाव में ओबीसी दांव खेलने की तैयारी में है। इसके लिए अपने चुनावी घोषणा पत्र में ओबीसी एक्ट लाने का वादा शामिल करेगी। अगर कांग्रेस सत्ता में आई, तो यह एक्ट एससी-एसटी की तरह प्रभावी हो सकता है। पढ़िए पूरी स्टोरी…
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यह खबर Dainik Bhaskar Uttar Pradesh से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

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