10 अक्टूबर 2026, 3:28 PM
हर खबर, हर पल
हमारे बारे मेंसंपर्क
टॉप स्टोरी

दिल्ली में ब्रिक्स: दुनिया बदल रही है, और ब्रिक्स भी बदल रहा है !

नई दिल्ली में दो दिन से चल रही 18वीं ब्रिक्स समिट 13 सितंबर को सिमट चुकी है. और विदेशी नेता भी दिल्ली से रवाना हो चुके हैं या होने लगे हैं . चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी दिल्ली से रवाना हो चुके हैं. इस बार की बैठक इसलिए ख़ास है क्योंकि दुनिया

दिल्ली में ब्रिक्स: दुनिया बदल रही है, और ब्रिक्स भी बदल रहा है !
स्रोत: abp news world
शेयर करेंWhatsAppFacebook

नई दिल्ली में दो दिन से चल रही 18वीं ब्रिक्स समिट 13 सितंबर को सिमट चुकी है. और विदेशी नेता भी दिल्ली से रवाना हो चुके हैं या होने लगे हैं . चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी दिल्ली से रवाना हो चुके हैं.

इस बार की बैठक इसलिए ख़ास है क्योंकि दुनिया एक बेहद ख़तरनाक दौर से गुज़र रही है. एक तरफ़ अमेरिका और ईरान के बीच जंग के और फैलने का ख़तरा  है, दूसरी तरफ ग़ज़्ज़ा में सीज़फायर के बावजूद फिलिस्तीनी इलाकों में इज़राइली हमले जारी हैं. और उधर यमन में ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने लाल सागर के बेहद अहम बंदरगाह मोखा पर कब्ज़ा कर लिया है.

इसलिए दिल्ली में बैठे मोदी, पुतिन, शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के सामने सिर्फ व्यापार या विकास का सवाल नहीं था—सवाल यह भी था कि दुनिया की बड़ी उभरती ताकतें इस बदलती हुई दुनिया में आखिर अपनी सामूहिक आवाज़ कितनी मजबूत कर सकती हैं. ब्रिक्स में अब 11 देश हैं और ये देश दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं.

मोदी और शी की मुलाक़ात, शायद सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम

समिट से अलग नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात पर पूरी दुनिया की निगाह थी. शी करीब सात साल बाद भारत आए हैं. दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति, व्यापार, बाज़ार तक पहुंच और दोनों देशों के रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने पर बात की. मोदी ने साफ़ कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता अच्छे भारत-चीन संबंधों की बुनियाद है. शी ने लंबे समय का नजरिया अपनाने और आपसी सहयोग बढ़ाने की बात कही.

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत ब्रिक्स के दो सबसे बड़े सदस्य हैं, लेकिन दोनों के बीच सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी है. यानी ब्रिक्स को मज़बूत बनाना है तो भारत-चीन रिश्ते सुधरना बेहद ज़रूरी है.

पुतिन का बड़ा प्रस्ताव—Su-57

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की बातचीत भी काफी अहम रही. रूस ने भारत को अपने पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक स्टील्थ फाइटर सुखोई Su-57 की पेशकश की है. लेकिन यह सिर्फ विमान बेचने का मामला नहीं है. रूस ने भारत के साथ Su-57 की संयुक्त उत्पादन और तकनीक साझा करने की पेशकश की है. इसके अलावा भारत के Su-30MKI विमानों को बड़े स्तर पर अपग्रेड करके “सुपर सुखोई” बनाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है. अगर भारत Su-57 के संयुक्त उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर आगे बढ़ता है, तो यह भारतीय वायुसेना के लिए बड़ा फ़ैसला   होगा. हालांकि अभी इसे अंतिम डील समझना जल्दबाजी होगी.

ब्रिक्स की कॉमन करेंसी, असल कहानी क्या है?

ब्रिक्स में अपनी एक अलग “ब्रिक्स करेंसी” बनाने की कोई औपचारिक योजना इस समिट में पास नहीं हुई. फरवरी 2026 में ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने एक इंटरव्यू में साफ़  कहा था कि ब्राज़ील ब्रिक्स की नई मुद्रा बनाने का प्रस्ताव नहीं कर रहा. उनकी बात थी कि देशों को डॉलर पर निर्भरता कम करने और आपस में अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करने की संभावना तलाशनी चाहिए.

यानी बात “एक नई ब्रिक्स करेंसी” से ज़्यादा डॉलर के बजाय रुपये, युआन, रूबल, रियाल, रियाल आदि में आपसी व्यापार और भुगतान की है. और यहां भारत का रुख़ अपेक्षाकृत सावधान है. भारत ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी आर्थिक गठबंधन में बदलना नहीं चाहता. मोदी ने भी बार-बार कहा है कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है. यही शायद ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है.

चीन डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है, रूस पश्चिमी प्रतिबंधों से बाहर निकलने का रास्ता चाहता है, ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों से परेशान है, जबकि भारत अमेरिका के साथ भी अपने रिश्ते मज़बूत रखना चाहता है. इसीलिए ब्रिक्स में एक जैसी विदेश नीति बनाना आसान नहीं है.  कि चीन-भारत तनाव, अलग-अलग भू-राजनीतिक हित और ब्रिक्स को कितना राजनीतिक बनाया जाए, इन सब पर सदस्य देशों में मतभेद हैं.

मध्य-पूर्व का संकट ब्रिक्स के सामने

इस समिट का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा शायद यही था. ब्रिक्स के 11 देशों ने नई दिल्ली डिक्लेरेशन में मध्य-पूर्व की बिगड़ती स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और ज़्यादा संयम बरतने, बातचीत और कूटनीति के रास्ते से समाधान निकालने की अपील की. ख़ास बात यह है कि ब्रिक्स में एक तरफ ईरान है और दूसरी तरफ यूएई  जैसे देश हैं, जिनके हित इस संघर्ष में अलग-अलग हैं. इसके बावजूद दोनों ने संयुक्त बयान का समर्थन किया.

चीन के शी जिनपिंग ने तो ब्रिक्स से मध्य-पूर्व में शांति क़ायम कराने में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की. उधर यमन में हूती लड़ाकों ने रणनीतिक मोखा बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया है. यह जगह बाब-अल-मंदेब के नज़दीक है और दुनिया के अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक पर इसका असर पड़ सकता है. 

गाज़ा और ब्रिक्स की भाषा

गाज़ा को लेकर भी ब्रिक्स ने युद्धविराम, मानवीय मदद और फ़िलिस्तीन के अधिकारों का समर्थन किया है. लेकिन यहां भी एक दिलचस्प बात है, अंतिम घोषणा की भाषा काफी सावधान रखी गई है. पश्चिमी मीडिया बहसों में ब्रिक्स की यही समस्या सामने आती रही है: संगठन में इतनी अलग-अलग राजनीतिक सोच वाले देश हैं कि कड़ा और एकजुट राजनीतिक बयान देना मुश्किल हो जाता है. यानी ब्रिक्स अमेरिका और पश्चिमी व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता तो रखता है, लेकिन अभी वह नाटो जैसा एकजुट राजनीतिक-सैन्य गठबंधन नहीं है.

और इसी बीच दिल्ली के आम लोग.

इस पूरी अंतरराष्ट्रीय चमक-दमक का दूसरा पहलू दिल्ली की सड़कों पर दिखाई दिया. समिट के कारण कई इलाकों में ट्रैफिक प्रतिबंध और डायवर्जन लगाए गए. 35 से ज्यादा सड़कें प्रभावित हुईं और 22 डायवर्जन प्वाइंट बनाए गए. सरकारी दफ्तर और स्कूल 11 सितंबर को बंद रखे गए थे,लेकिन मेट्रो चलती रही और 13 सितंबर को तो सभी लाइनों पर सुबह 6 बजे से सेवा शुरू की गई.

फिर भी आम लोगों को परेशानी हुई, खासकर उन लोगों को जो रोज़ काम के लिए एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाते हैं. कई कर्मचारियों, डिलीवरी वर्करों और कम आमदनी वाले लोगों को लंबे और महंगे रास्ते अख़्तियार करने पड़े.

और सबसे ज्यादा विवाद उन नीले-सफेद पर्दों को लेकर हुआ जो वसंत विहार के कूली कैंप जैसी बस्तियों के सामने लगाए गए. स्थानीय लोगों का कहना था कि शायद सर्कार हमें कूड़ा समझती है इसलिए विदेशी मेहमानों की नज़र से बस्ती को छिपाने के लिए ऐसा किया गया है,वहीँ कांग्रेस के साशनकाल में ऐसा नहीं होता था. यही तस्वीर इस पूरे आयोजन का एक बड़ा विरोधाभास दिखाती है, दुनिया को ग्लोबल साउथ की आवाज़ दिखाने वाली समिट उसी ग्लोबल साउथ के गरीब लोगों को पर्दे के पीछे क्यों रखे?

अब एक बड़ा सवाल, आख़िर ब्रिक्स से हासिल क्या हुआ?

मेरी नज़र में इस समिट को न तो “बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत” कहना ठीक होगा और न ही “ब्रिक्स पूरी तरह नाकाम है.” सबसे बड़ा हासिल यह है कि 11 अलग-अलग देशों ने इतने गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच एक साझा घोषणा पर सहमति बनाई. संयुक्त राष्ट्र में सुधार, ग्लोबल साउथ की ज़्यादा हिस्सेदारी, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल सहयोग जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने की बात हुई. 

लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी.

क्या ब्रिक्स सिर्फ हर साल एक समिट करके घोषणाएं करता रहेगा, या हक़ीक़त में डॉलर पर निर्भरता घटाने वाला पेमेंट सिस्टम, मज़बूत आपसी व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी सहयोग और राजनीतिक समन्वय तैयार कर पाएगा? मुझे लगता है कि निकट भविष्य में ब्रिक्स की अपनी अलग करेंसी बनने की संभावना कम है, लेकिन राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और ब्रिक्स पे जैसे भुगतान तंत्र धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं.

और भारत शायद इसी रास्ते को पसंद करेगा, ब्रिक्स में रहकर चीन और रूस के साथ काम करना, लेकिन अमेरिका और यूरोप से अपने रिश्ते भी ख़राब न करना.
यही मोदी की मौजूदा विदेश नीति का मूल संतुलन है. इसलिए दिल्ली समिट का सबसे बड़ा संदेश शायद यह नहीं है कि ब्रिक्स अब पश्चिम का विकल्प बन गया है. बल्कि यह है कि दुनिया अब एक ही ताकत के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहती, लेकिन नई मल्टीपोलर  दुनिया बनाने वालों के बीच ख़ुद भी काफ़ी  मतभेद हैं. और आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की असली ताक़त इस बात से तय होगी कि वह इन मतभेदों के बावजूद कितना काम करके दिखाता है.

समाचार स्रोत

यह खबर abp news world से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

मूल स्रोत देखें ↗