भारत के पास ज्ञान परंपरा, दुनिया ने योग को माना:गोरखपुर में CM ने कहा-हमारे पास तक्षशिला-नालंदा विवि की विरासत, विकसित देशों का इतिहास 400 साल का
गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने एक पंक्ति लिखी थी 'हम क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे अभी,आओ मिलकर विचारें हम सभी'। अपने भविष्य को लेकर, वर्तमान एवं भूत को लेकर भारत के विद्वानों ने हमेशा से चिंतन किया है। चिंतन की उसी परंपरा को ध्यान में रखकर भारतीय ऋषि हमेशा अपनी धरोहर को किसी न किसी

गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने एक पंक्ति लिखी थी 'हम क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे अभी,आओ मिलकर विचारें हम सभी'। अपने भविष्य को लेकर, वर्तमान एवं भूत को लेकर भारत के विद्वानों ने हमेशा से चिंतन किया है। चिंतन की उसी परंपरा को ध्यान में रखकर भारतीय ऋषि हमेशा अपनी धरोहर को किसी न किसी रूप में संरक्षित करते रहे हैं। 2020 में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों को भारत की ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने को प्रेरित किया। उसी क्रम में जब भारत में प्राचीन पांडुलिपियों, ताम्र पत्रों को संरखित करने की बात शुरू हुई, जो जहां-तहां बिखरी हुई थीं। कहीं शिलालेखों के माध्यम से, कहीं पांडुलिपियों के माध्यम से कहीं ताम्र पत्रों के माध्यम से। सीएम ने यह बातें गोरखपुर में आज ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं एवं ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की12वीं पुण्यतिथि के दौरान कहीं। इस अवसर पर उनकी स्मृति में सात दिवसीय श्रद्धांजलि समारोह 24 सितंबर से 30 सितंबर तक गोरखनाथ मंदिर में आयोजित होगा। इसके अंतर्गत संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान-यज्ञ का शुभारंभ 23 सितंबर को हो चुका है। श्रद्धांजलि समारोह के अंतर्गत् समसामयिक विषयों पर सम्मेलन का उद्घाटन गुरुवार को हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस अवसर पर 'भारतीय ज्ञान परंपरा का वर्तमान परिप्रेक्ष्य'विषय पर अपनी बात रखेंगे। सीएम ने कहा- ज्ञान की धरोहर को संरक्षित किया जा रहा है जब इन सभी मुद्दों को लेकर काम शुरू हुआ और उनके बारे में लोग जानने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं तो उसका महत्व सभी को समझ में आ रहा है। प्रदेश में कई शहरों में उस ज्ञान की धरोहर को संरक्षित करने के लिए हमें पांडुलिपियां, ताम्रपत्र व शिलालेख उपलब्ध हुए हैं। उसके माध्यम से तत्कालीन समाज की जानकारी भी मिल रही है। दुनिया में अकेले भारतीय समाज होगा, जिसने ज्ञान को केवल अक्षर की जानकारी का माध्यम नहीं बनाया। भारत के पास दुनिया की सबसे अच्छी जलवायु है, सबसे अच्छी उर्वरा भूमि है, सबसे अच्छा जल संसाधन है, सब कुछ हमारे पास है। लेकिन दुनिया के भीतर हमारी पहचान क्या थी। लेकिन हम ज्ञान की परंपरा के कारण विश्व गुरु कहलाते थे। उसपर हमारा एकाधिकार था। आज के जो विकसित देश हैं, उनका इतिहास 400 से 500 वर्षों का है। लेकिन हमारे पास आज से 2600 वर्ष पहले तक्षशिला जैसा विश्वविद्यालय था। आज से 1800 वर्ष पहले नालंदा का विश्वप्रसिद्ध विवि था। कुंभ के जो आयोजन हैं, वहां पर जाकर केवम संगम में स्नान करने का महत्व नहीं था। जबकि देश के चार महत्वपूर्ण केद्रों में एकत्र होकर भारत के विद्वानों की परंपरा, अपने नवाचारों को लेकर परस्पर चर्चा-परिचर्चा करते थे। प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जेन व नासिक त्रयम्बकेशवर में कुंभ की परपंरा आगे बढ़ी। हमारी ज्ञान की धरोहर को दुनिया ने मान्यता दी, दुनिया में योग दिवस का आयोजन मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने अपनी स्मृति पटल पर अपने ज्ञान की धरोहर को बनाए रखा है। यही कारण है कि आज उसको मान्यता मिली। दुनिया के 190 देश 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाते हैं। 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धति को आयुष के रूप में मान्यता दी। इन परंपराओं को आज वैश्विक मान्यता मिल रही है। विदेशी आक्रांता जब आए थे तो केवल लूटपाट करने नहीं आए थे। इसके साथ ही भारत की बुद्धि को पूरी तरह अपहरण करके उसको नष्ट करना था। उन्होंने यही किया। आखिर मंदिरों को तोड़ने का क्या उद्देश्य था, वह तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ रहे थे। लेकिन उनका लक्ष्य भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करना था। आक्रांता बल के दम पर करते थे। ब्रिटिश कालखंड में भी यही हुआ। ब्रिटिशर ने भारत में आकर भ्रम पैदा करके किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत नहीं, अंग्रेजी श्रेष्ठ भाषा है। उन्होंने आयुर्वेद की जगह मार्डन मेडिसिन को महत्व दे दिया। परिणाम क्या हुआ, हम धीरे-धीरे करके अपनी परंपरा से कटते गए। हमें अपने जड़ों से काटा गया। काशी में उत्तरवाहिनी गंगा की पूजा क्यों की जाती है क्योंकि जब उसका रुख उत्तर की ओर होता है तो वह अपनी जड़ों की ओर देखने की स्थिति में होती है। हमें अपने जड़ों की ओर जाना होगा। आज उसे अपनी परंपरा के साथ जोड़ना होगा। कौन ऐसा क्षेत्र था, जिसमें भारत का ज्ञान अद्भुत न रहा हो। मुख्यमंत्री योगी ने कहा- भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने के मार्ग में तीन बिन्दु महत्वपूर्ण रोजाना होने वाले कार्यक्रम श्रद्धांजलि समारोह में यह शामिल रहेंगे श्रद्धांजलि समारोह में कथावाचक वृंदावन के स्वामी राजेंद्रदासदास देवाचार्य, रोहतक हरियाणा के महंत बालकनाथ, जूनागढ़ गुजरात के महंत शेरनाथ, नैमिषारण्य के स्वामी विद्या चैतन्य, गाजियाबाद के महंत नारायण गिरी, वाराणसी से डॉ. रामकमलदास वेदांती, हरिद्वार के महंत चेताईनाथ, कच्छ गुजरात से महंत देवनाथ, वाराणसी के महंत संतोषदास, गुजरात के महंत कमलनाथ, प्रयागराज के जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी विश्वेश प्रपन्नाचार्य, अयोध्या के महंत रामदिनेशाचार्य, वामी श्रीधराचार्य, महंत राघवाचार्य, महंत रामलखनदास, महंत धर्मदास, ब्रह्मचारी दासलाल, महन्त राघवेशदास, महंत राजूदास, देवीपाटन के महंत मिथलेशनाथ, पीर शेरनाथ, योगी लालनाथ, महंत नरसिंहदास, महंत शिवनाथ, योगी जिताईनाथ, जगद्गुरू स्वामी घनश्यामाचार्य, महंत गंगादास सहित देशभर के प्रतिष्ठित धर्माचार्य, साधु एवं संत सम्मिलित होंगे। नई दिल्ली, बिहार से आएंगे अतिथि
विभिन्न तिथियों के सम्मेलनों में डॉ. वी. रामानाथन (आईआईटी, बीएचयू, वाराणसी), प्रो. विनोद सोलंकी (प्रांत प्रशिक्षण प्रमुख, स्वामी विवेकानन्द केंद्र उत्तर प्रदेश), प्रो. संजीव कुमार शर्मा (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतीहारी, बिहार,) प्रो. मुरली मनोहर पाठक, कुलपति (श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली), श्याम बिहारी गुप्ता (अध्यक्ष, गोसेवा आयोग उ.प्र.) जसवंत सिंह उर्फ अतुल सिंह (उपाध्यक्ष, गोसेवा आयोग उ.प्र), प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा (पूर्व अध्यक्ष, उच्च शिक्षा आयोग प्रयागराज), प्रो. शिवशरण दास, (भगवती निवास, आर्यनगर गोरखपुर), डॉ. पृथ्वीनाथ सिंह, (सीनियर रेजीडेन्ट, गर्वमेन्ट मेडिकल कालेज अम्बेडकरनगर), प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह निदेशक (गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज), प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त (पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ) लालमणि त्रिपाठी (गीताप्रेस, गोरखपुर) द्वारा विशद चर्चा की जाएगी।
समाचार स्रोत
यह खबर Dainik Bhaskar Uttar Pradesh से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।
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