31 अक्टूबर 2026, 6:40 PM
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बिहार की राजनीति में फिर सवर्णों का दबदबा? MLC चुनाव के रिजल्ट से समझें

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव परिणाम में सवर्ण उम्मीदवारों का दबदबा देखने को मिला है. चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से हुए चुनाव में छह सवर्ण उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. इनमें चार भूमिहार, एक राजपूत और एक ब्राह्मण प्रत्याशी शामिल हैं. वहीं, दो उम्मीदवार पिछड़ी जाति से जीते हैं.&

बिहार की राजनीति में फिर सवर्णों का दबदबा? MLC चुनाव के रिजल्ट से समझें
स्रोत: abp news world
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बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव परिणाम में सवर्ण उम्मीदवारों का दबदबा देखने को मिला है. चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से हुए चुनाव में छह सवर्ण उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. इनमें चार भूमिहार, एक राजपूत और एक ब्राह्मण प्रत्याशी शामिल हैं. वहीं, दो उम्मीदवार पिछड़ी जाति से जीते हैं.

इस नतीजे के बाद बिहार की राजनीति में सवर्णों के बढ़ते प्रभाव और इसके पीछे के कारणों पर चर्चा शुरू हो गई है. क्या यह जातीय प्रभाव का नतीजा है या मतदाताओं ने दूसरे मुद्दों को प्राथमिकता दी? राजनीतिक विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय ने इसके पीछे कई वजहें बताई हैं.

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UGC एक्ट के विरोध को बताया बड़ी वजह

सुनील पांडेय के मुताबिक, इस चुनाव में सवर्ण उम्मीदवारों की बड़ी संख्या में जीत को केंद्र सरकार के UGC एक्ट के विरोध से जोड़कर भी देखा जा सकता है. उनका मानना है कि सवर्ण समाज के एक वर्ग में इस मुद्दे को लेकर नाराजगी है और उसका असर चुनाव परिणाम पर पड़ा हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अपेक्षाकृत पढ़े-लिखे और जागरूक होते हैं. उनके अनुसार, सवर्ण समाज से अधिक उम्मीदवारों को टिकट मिलना भी जीत के आंकड़ों को प्रभावित करने वाला कारण हो सकता है.

दबंग राजनीति से आगे बढ़ रहे मतदाता

सुनील पांडेय ने बिहार की राजनीति के पुराने दौर का जिक्र करते हुए कहा कि 1990 के दशक से पहले राजो, रघुनाथ और प्रभुनाथ जैसे नेताओं की चर्चा होती थी. उस समय दबंग छवि वाले नेताओं का चुनावी राजनीति में प्रभाव माना जाता था. लेकिन अब स्थिति बदल रही है. उनके मुताबिक, इस चुनाव में मतदाताओं ने जातीय पहचान से आगे बढ़कर उम्मीदवारों की योग्यता और काम को महत्व दिया. उन्होंने कहा कि लोग समझ रहे हैं कि जाति और धर्म के आधार पर समाज को बांटने से विकास नहीं हो सकता.

2025 विधानसभा चुनाव के नतीजों से भी जोड़ा

विशेषज्ञ ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का भी उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि उस चुनाव में भी राजपूत और भूमिहार समाज के कई उम्मीदवार विधायक बने थे. उनके मुताबिक, यह संकेत है कि मतदाता अब जातीय समीकरण के साथ-साथ दूसरे पहलुओं पर भी विचार कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने MLC चुनाव में UGC एक्ट को लेकर नाराजगी को भी एक अहम संभावित वजह बताया.

बीजेपी नेता बोले- अब जाति से ऊपर उठकर हो रहा मतदान

बीजेपी नेता राकेश रोशन ने भी चुनाव परिणाम को केवल जातीय दबदबे के रूप में देखने से इनकार किया. उन्होंने कहा कि पहले के दौर में दबंगता के आधार पर वोट प्रभावित करने की कोशिश होती थी, लेकिन अब मतदाता अधिक जागरूक हो गए हैं. उन्होंने सारण शिक्षक सीट से जीते डॉ. राहुल राज का उदाहरण दिया. राकेश रोशन के मुताबिक, राहुल राज पहले से बीजेपी के कार्यकर्ता थे और इस सीट पर लंबे समय से मेहनत कर रहे थे.

एनडीए में सीट जेडीयू के खाते में जाने के बावजूद उनकी जीत उनकी मेहनत का नतीजा है. उन्होंने कहा कि किसी एक नेता के यह दावा करने का कोई आधार नहीं है कि उसने किसी उम्मीदवार को जिताया है. उनके मुताबिक, सरकार जाति नहीं, जमात के आधार पर काम करने में विश्वास रखती है.

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यह खबर abp news world से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

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