विधायक कोटे का MLC चुनाव भी नवंबर-दिसंबर में!:जनवरी में 10 सीटें खाली होंगी; आचार संहिता के चलते 2 महीने पहले इलेक्शन
विधान परिषद में विधायक कोटे की 10 सीटों पर नवंबर-दिसंबर में चुनाव हो सकते हैं। मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 30 जनवरी, 2027 को खत्म हो रहा है। यूपी विधानसभा चुनाव के चलते जनवरी में आचार संहिता लागू हो सकती है। ऐसे में इन सीटों पर जनवरी की जगह एक-दो महीने पहले चुनाव कराए जा सकते हैं। वैसे भी चुनाव आयोग ने शिक्षक और स्नातक निर्वाचन कोट

विधान परिषद में विधायक कोटे की 10 सीटों पर नवंबर-दिसंबर में चुनाव हो सकते हैं। मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 30 जनवरी, 2027 को खत्म हो रहा है। यूपी विधानसभा चुनाव के चलते जनवरी में आचार संहिता लागू हो सकती है। ऐसे में इन सीटों पर जनवरी की जगह एक-दो महीने पहले चुनाव कराए जा सकते हैं। वैसे भी चुनाव आयोग ने शिक्षक और स्नातक निर्वाचन कोटे की 11 सीटों पर अक्टूबर में चुनाव कराने की घोषणा की है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी दफ्तर के एक अधिकारी बताते हैं- जनवरी में खाली हो रहीं विधायक कोटे की MLC सीटों के लिए विधायक वोट देते हैं। जनवरी के पहले-दूसरे सप्ताह में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से विधायक वोट नहीं डाल सकेंगे। लिहाजा नवंबर-दिसंबर में ही चुनाव करा लिया जाएगा। जिससे मौजूदा विधायक ही नए सदस्यों का चुनाव कर सकें। वर्तमान में भाजपा के 8 MLC चुने जाने के लिए पर्याप्त संख्या बल है। इसलिए पार्टी की भी कोशिश रहेगी कि जल्द इन सीटों पर भी चुनाव करा लिए जाएं। भाजपा की एक सीट घटेगी, सपा को फायदा खाली हो रही 10 सीटों पर जनवरी, 2021 में चुनाव हुआ था। तब भाजपा के 304 और सपा के 47 विधायक थे। एक सीट जीतने के लिए 31 विधायकों की जरूरत होती है। इस हिसाब से भाजपा 9 और सपा को 1 सीट मिली थी। वहीं, वर्तमान में भाजपा के पास 256 और सपा के पास 101 विधायक हैं। भाजपा के सहयोगी दलों के 33 विधायक, 3 असंबद्ध और राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के 2 विधायक भी जोड़ लें, तो संख्या 294 होती है। ऐसे में भाजपा को 8 और सपा को 2 सीटें मिलनी तय हैं। विधानसभा में बसपा के एक भी विधायक नहीं है। लिहाजा भाजपा या सपा के समर्थन के बिना उनके प्रत्याशी का नामांकन तक दाखिल नहीं हो सकेगा। 2-3 बार के भाजपा MLC को विधानसभा चुनाव लड़ाने की तैयारी भाजपा सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय नेताओं में इस बात पर सहमति बनी है कि जो कार्यकर्ता 2 या 3 बार विधान परिषद या राज्यसभा सदस्य बन चुके हैं, उन्हें मौका न दिया जाए। उन्हें विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ाया जाए। भाजपा राष्ट्रीय महासचिव भूपेंद्र यादव को राजस्थान की अलवर और पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को ओडिशा की संबलपुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा चुकी है। पार्टी के एक पदाधिकारी ने बताया कि विधान परिषद चुनाव में भी यही फार्मूला लागू हुआ, तो कई दिग्गज नेताओं को विधानमंडल का सदस्य बने रहने के लिए विधानसभा चुनाव लड़ना पड़ सकता है। अब जानिए किन चेहरों को मिल सकता है दोबारा मौका… कुंवर मानवेंद्र सिंह: दूसरी बार विधान परिषद सदस्य हैं। इससे पहले 2000 से 2006 तक सदस्य रहे। इस वक्त विधान परिषद के सभापति का जिम्मा भी उन्हीं के पास है। मानवेंद्र 1985 से 1989 तक झांसी की गरौठा सीट से विधायक भी रहे हैं। वे करीब 74 साल के हैं। ऐसे में पार्टी फिर से उन्हें मौका देगी या उनके परिवार के किसी युवा चेहरे को आगे बढ़ाएगी, इसका फैसला सीएम योगी के स्तर से होगा। स्वतंत्र देव सिंह: जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह तीसरी बार विधान परिषद सदस्य हैं। वे पहली बार 2004 से 2010 तक और फिर 2017 से 2021 तक MLC रह चुके हैं। उनको पार्टी का कद्दावर नेता माना जाता है। कुर्मी समाज में उनकी मजबूत पकड़ है। पार्टी उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड की किसी कुर्मी बहुल सीट से चुनाव लड़ा सकती है। हालांकि, आखिरी फैसला प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होगा। अरविंद शर्मा: ऊर्जा मंत्री 2021 में पहली बार विधान परिषद सदस्य बने थे। शर्मा मऊ जिले के रहने वाले हैं, जहां भूमिहार मतदाता अच्छी संख्या में हैं। पीएम नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद शर्मा को फिर से विधान परिषद भेजा जाएगा या चुनाव लड़ाया जाएगा, इसका फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय से होगा। हालांकि, शर्मा पहली बार के MLC हैं, इसलिए पार्टी उन्हें फिर से मौका दे सकती है। धर्मवीर प्रजापति: राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मवीर प्रजापति भी दूसरी बार MLC हैं। 2017 में उन्हें पहली बार MLC बनाया गया था। सितंबर, 2021 में योगी सरकार 1.0 के दूसरे मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया था। योगी सरकार 2.0 में उन्हें फिर से होमगार्ड राज्यमंत्री बनाया गया। प्रजापति (कुम्हार) समाज में पकड़ होने के चलते धर्मवीर को तीसरी बार विधान परिषद सदस्य बनाया जा सकता है। हालांकि, उन्हें ब्रज की किसी सीट से चुनाव लड़ाए जाने की भी चर्चा है। अश्विनी त्यागी: भाजपा के पूर्व प्रदेश मंत्री अश्विनी त्यागी पहली बार विधान परिषद सदस्य हैं। कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और पूर्व महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल का भरोसेमंद होने के कारण उन्हें परिषद भेजा गया था। लोकसभा चुनाव में उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी का प्रभारी बनाया गया था। पीएम मोदी चुनाव तो जीते, लेकिन जीत का अंतर बहुत कम हो गया। त्यागी के पास वर्तमान में केंद्र या प्रदेश भाजपा टीम में कोई पद नहीं है। पार्टी इनकी जगह प्रदेश मंत्री बसंत त्यागी को परिषद सदस्य बनाने पर विचार कर रही है। गोविंद नारायण शुक्ला: पूर्व प्रदेश महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ला 2021 में पहली बार विधान परिषद सदस्य बने थे। शुक्ला 2014 से लगातार भाजपा की प्रदेश टीम के पदाधिकारी थे। इस बार उन्हें प्रदेश टीम में तो जगह नहीं मिली। लेकिन, अनुभव के चलते उन्हें प्रदेश मुख्यालय प्रभारी बनाया गया है। वे राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष के करीबी हैं। प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह से भी उनके रिश्ते अच्छे हैं। ऐसे में शुक्ला को फिर से मौका दिया जा सकता है। सलिल बिश्नोई: भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष सलिल बिश्नोई को पंकज चौधरी की टीम में जगह नहीं मिल पाई। वे दूसरी बार विधान परिषद सदस्य हैं। वे कानपुर की आर्यनगर और सीसामऊ सीट से चुनाव भी लड़ चुके हैं, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पार्टी सूत्रों का मानना है कि इस बार बिश्नोई को ड्रॉप करके किसी नए चेहरे को मौका दिया जा सकता है। धर्मेंद्र सिंह: लगातार दूसरी बार पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। 2021 में वे गोरखपुर क्षेत्र के अध्यक्ष थे। तभी सीएम योगी की पसंद से उन्हें विधान परिषद सदस्य बनाया गया था। सीएम योगी का करीबी होने के कारण धर्मेंद्र सिंह को फिर से मौका मिलने की संभावना है। सुरेंद्र चौधरी: 2021 में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की पैरवी से विधान परिषद सदस्य बने थे। पार्टी ने 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें प्रयागराज की सोरांव सीट से टिकट दिया था। लेकिन, अपना दल से गठबंधन के बाद यह सीट उसके खाते में चली गई। ऐसे में सुरेंद्र को नामांकन वापस लेना पड़ा था। तब उन्हें MLC बनाने का वादा किया गया था। मौर्य की पैरवी पर उन्हें MLC बनाया गया था। सुरेंद्र धोबी समाज से आते हैं। इन दिनों कहा जा रहा है कि उन्होंने डिप्टी सीएम मौर्य का पाला छोड़कर प्रयागराज में उनके विरोधी गुट का साथ दे रहे हैं। ऐसे में उन्हें मौका मिलता है या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा। राजेंद्र चौधरी: समाजवादी पार्टी के राजेंद्र चौधरी का कार्यकाल भी 30 जनवरी को समाप्त हो रहा है। वे पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सबसे करीबी और भरोसेमंद नेता हैं। उन्हें फिर से परिषद भेजा जाना तय माना जा रहा है। --------------------------------- यह खबर भी पढ़ें… अचानक UGC का मुद्दा कैसे गरमाया, आगरा में 21 दिन में 3 बड़े प्रदर्शन; दलित बहुल जिले में ही सवर्ण आंदोलन क्यों आगरा में रविवार (20 सितंबर) को UGC के विरोध में सवर्ण समाज के करीब 1500 युवक 200 ट्रैक्टरों के साथ सड़क पर उतर आए। यमुना एक्सप्रेस-वे जाम कर दिया। पुलिस को बुलडोजर, जेसीबी और क्रेन लगाकर उन्हें रोकना पड़ा। UGC को लेकर पिछले 21 दिनों में यह तीसरा आंदोलन था। पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…
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यह खबर Dainik Bhaskar Uttar Pradesh से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।
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