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Explained: दवा की कीमत तय होने से लूट तक पूरा खेल! सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या बदलेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को दवा कंपनियों और अस्पतालों की मुनाफाखोरी पर सीधा सवाल उठाया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि जब एक कैंसर की दवा खुदरा विक्रेता को 2,700 रुपए में दी जाती है, लेकिन मरीज से 27,000 रुपए वसूले जाते हैं, तो यह सिर्फ मुनाफा नहीं, 'कत्लेआम' है. अ

Explained: दवा की कीमत तय होने से लूट तक पूरा खेल! सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या बदलेगा?
स्रोत: abp news world
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सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को दवा कंपनियों और अस्पतालों की मुनाफाखोरी पर सीधा सवाल उठाया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि जब एक कैंसर की दवा खुदरा विक्रेता को 2,700 रुपए में दी जाती है, लेकिन मरीज से 27,000 रुपए वसूले जाते हैं, तो यह सिर्फ मुनाफा नहीं, 'कत्लेआम' है. अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब ड्रग्स (प्राइसेज कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 में 16 प्रतिशत खुदरा मार्जिन तय है, तो इसे हर दवा पर लागू क्यों नहीं किया जाता. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से दो हफ्ते का समय मांगा है. अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी. तो इससे पहले समझ लें कैसे तय होती हैं दवा की कीमतें और लूट के तरीके क्या हैं...

दवा की कीमतें तय कैसे होती हैं?

भारत में दवाओं की कीमतें दो हिस्सों में बंटी हैं:

  • शेड्यूल्ड दवाएं: ये वो दवाएं हैं जो नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) में शामिल हैं. इनकी कीमत नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) तय करती है. NPPA बाजार में मौजूद उन सभी ब्रांड्स की औसत कीमत निकालती है जिनकी मार्केट शेयर 1 प्रतिशत या ज्यादा है और उसमें 16 प्रतिशत खुदरा मार्जिन जोड़कर सीलिंग प्राइस तय करती है. जुलाई 2026 तक NPPA ने 935 फॉर्मूलेशन्स की सीलिंग प्राइस तय कर रखी है. NLEM 2022 में 388 दवाएं शामिल हैं.
  • नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं: ये वो दवाएं हैं जो इस लिस्ट से बाहर हैं. इनकी शुरुआती कीमत कंपनी खुद तय करती है. सरकार सिर्फ इतना कंट्रोल रखती है कि कंपनी एक साल में MRP में 10 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं कर सकती. यहीं सबसे बड़ा खेल है.

लूट कहां और कैसे हो रही है?

नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं भारत के फार्मा मार्केट की बड़ी हिस्सेदारी रखती हैं. इनमें कंपनी अपनी मर्जी से कीमत तय कर सकती है. संसद की स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, एक आम एंटीहिस्टामिन गोली जिसकी MRP 21 रुपए है, वो स्टॉकिस्ट को 1.85 रुपए में दी जाती है, यानी 1,038 प्रतिशत का मार्क-अप.

एक कैल्शियम सप्लीमेंट की MRP 327 रुपए है, जबकि सप्लाई प्राइस सिर्फ 16.95 रुपए, यानी 1,831 प्रतिशत का मुनाफा. राज्यसभा में भी यह मुद्दा उठा कि एक दवा जिसकी लागत 25 रुपए है, वो 132 रुपए में बिक रही है.

सप्लाई चेन में मार्जिन का गणित देखें तो कंपनी 40 से 60 प्रतिशत मार्जिन रखती है, डिस्ट्रीब्यूटर 8 से 15 प्रतिशत और रिटेलर 20 से 25 प्रतिशत. शेड्यूल्ड दवाओं में DPCO के तहत होलसेलर को 8 प्रतिशत और रिटेलर को 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है. नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं में कोई सीमा नहीं है.

अस्पतालों का कैप्टिव मार्केट

सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ी समस्या उठाई है कि कॉर्पोरेट अस्पताल मरीजों को अपनी ही केमिस्ट्री से दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं. अगर मरीज बाहर से दवा लाता है तो अस्पताल इलाज की जिम्मेदारी नहीं लेता. इससे मरीज के पास विकल्प नहीं बचता और वो ऊंची कीमत चुकाने को मजबूर होता है.

वहीं, जब इलाज आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजना के तहत होता है, तो यही ऊंची कीमत टैक्सपेयर्स के पैसे से चुकाई जाती है. सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि असली फायदा फार्मा कंपनियों को नहीं, प्राइवेट अस्पतालों को हो रहा है.

सरकार ने पहली बार मानी गलती

इस मामले में एक बड़ा मोड़ यह आया कि केंद्र सरकार ने पहली बार सुप्रीम कोर्ट में यह माना कि दवाओं की कीमतों में गड़बड़ी है और वो इसे ठीक करने की कोशिश करेगी. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर विरोधी रुख नहीं अपना रही है और समाधान निकालने के लिए अधिकारियों से बात करेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कुछ दवाओं की कीमत कंट्रोल करना और बाकी को मनमानी से बेचने देना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि सभी दवाएं जरूरी हैं.

12 अक्टूबर के बाद अब क्या बदलेगा?

कोर्ट ने अभी कोई फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन इस बेंच ने बहुत साफ संदेश दिया है कि 16 प्रतिशत मार्जिन की सीमा हर दवा पर लगनी चाहिए, चाहे वो शेड्यूल्ड हो या नॉन-शेड्यूल्ड. अगर सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है, तो कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगेगी.

असली चुनौती यह है कि सरकार को फार्मा इंडस्ट्री और अस्पताल लॉबी के दबाव को झेलना होगा. संसद की कमेटी ने भी सरकार से ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन का स्थायी सिस्टम बनाने को कहा है, लेकिन यह फ्रेमवर्क पांच साल से लटका हुआ है. 12 अक्टूबर की सुनवाई तय करेगी कि अदालत सिर्फ सवाल पूछती है या कानून बदलवाने का आदेश भी देती है.

समाचार स्रोत

यह खबर abp news world से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

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