3 अक्टूबर 2026, 4:36 PM
हर खबर, हर पल
हमारे बारे मेंसंपर्क
राष्ट्रीय

'नहीं बताया कि असली मिशन...', भारत के ASAT टेस्ट से US में मची थी खलबली, समझें पूरी बात

करीब 28 साल पहले भारत ने पोखरण-II के परमाणु परीक्षण कर अमेरिका समेत दुनिया को चौंका दिया था. इसके बाद 27 मार्च 2019 को भारत ने मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण किया. अब अमेरिका के पूर्व वायुसेना खुफिया अधिकारी डेविड ग्रुश ने पॉडकास्टर जो रोगन को दिए एक इंटरव्यू में उस समय की स्थिति का

'नहीं बताया कि असली मिशन...', भारत के ASAT टेस्ट से US में मची थी खलबली, समझें पूरी बात
स्रोत: abp news world
शेयर करेंWhatsAppFacebook

करीब 28 साल पहले भारत ने पोखरण-II के परमाणु परीक्षण कर अमेरिका समेत दुनिया को चौंका दिया था. इसके बाद 27 मार्च 2019 को भारत ने मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण किया. अब अमेरिका के पूर्व वायुसेना खुफिया अधिकारी डेविड ग्रुश ने पॉडकास्टर जो रोगन को दिए एक इंटरव्यू में उस समय की स्थिति का जिक्र किया है. 

उन्होंने बताया कि परीक्षण के समय वह नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस यानी NRO के ऑपरेशंस सेंटर में ड्यूटी पर थे और भारतीय मिसाइल परीक्षण की जानकारी ने अमेरिकी खुफिया तंत्र को अचानक सक्रिय कर दिया था.

भारत ने मिसाइल टेस्ट की जानकारी दी थी, लेकिन असली लक्ष्य का पता नहीं था

डेविड ग्रुश के मुताबिक, भारत ने ओडिशा के तट के पास एक NOTAM यानी विमानन चेतावनी जारी की थी. इसका मतलब था कि अमेरिका को पता था कि भारत किसी मिसाइल का परीक्षण करने वाला है. लेकिन अमेरिकी खुफिया तंत्र को यह जानकारी नहीं थी कि इस परीक्षण में एंटी-सैटेलाइट हथियार का इस्तेमाल किया जाएगा.

ग्रुश ने बताया कि उस समय यह जानकारी बेहद सीमित दायरे में रखी गई थी. भारत ने भी परीक्षण से पहले सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया था कि उसका निशाना अंतरिक्ष में मौजूद कोई उपग्रह होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 मार्च 2019 की सुबह राष्ट्र के नाम संबोधन में मिशन शक्ति की घोषणा की थी.

3 मिनट में उपग्रह को बनाया निशाना

मिशन शक्ति के तहत भारत ने अपनी एंटी-सैटेलाइट मिसाइल से Microsat-R नाम के एक निष्क्रिय उपग्रह को निशाना बनाया था. परीक्षण सफल रहने के बाद भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया था, जिसके पास अंतरिक्ष में किसी उपग्रह को मार गिराने की रणनीतिक क्षमता होने की बात सामने आई.

ग्रुश ने बताया कि परीक्षण की जानकारी सामने आने के बाद NRO में अधिकारियों के बीच तेजी से गतिविधियां शुरू हो गई थीं. उस समय वह NRO के डिप्टी डायरेक्टर ऑफ इंटेलिजेंस के तौर पर काम कर रहे थे और एजेंसी के निदेशक के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की डेली ब्रीफिंग तैयार करने की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे.

कई फोन किए, पूछा- आखिर हुआ क्या?

ग्रुश ने उस समय की स्थिति को याद करते हुए बताया कि उनके कार्यालय में कई फोन थे और उन्होंने तुरंत अमेरिकी दूतावास समेत अलग-अलग जगहों पर संपर्क करना शुरू कर दिया. उनके मुताबिक, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हुआ है. उन्होंने बताया कि उनकी सबसे बड़ी चिंता अंतरिक्ष में बने मलबे को लेकर थी, क्योंकि NRO अमेरिकी जासूसी उपग्रहों का निर्माण और संचालन करता है. किसी उपग्रह को मिसाइल से नष्ट करने के बाद उसके टुकड़े अंतरिक्ष में फैल सकते थे और दूसरे उपग्रहों के लिए खतरा पैदा कर सकते थे.

अमेरिकी अधिकारियों ने मलबे का हिसाब लगाना शुरू किया

ग्रुश के मुताबिक, उन्होंने तुरंत NRO के ऑर्बिटल एनालिस्टों से संपर्क किया और उनसे मलबे के संभावित फैलाव का आकलन करने को कहा. यह भी पता लगाने को कहा गया कि क्या किसी अमेरिकी उपग्रह को संभावित खतरे से बचाने के लिए उसकी कक्षा बदलनी पड़ेगी. इसके बाद वह NRO निदेशक को जानकारी देने के लिए उनके कार्यालय पहुंचे. उन्होंने बताया कि वह वर्दी में तेजी से वहां पहुंचे और उस समय काफी तनावपूर्ण स्थिति थी.

भारत ने कहा था- मलबा कुछ हफ्तों में खत्म हो जाएगा

मिशन शक्ति के बाद भारत सरकार ने अंतरिक्ष में मलबे को लेकर उठी चिंताओं को कम करते हुए कहा था कि परीक्षण लो-अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में किया गया है. सरकार के मुताबिक, इससे पैदा हुआ मलबा कुछ हफ्तों में धीरे-धीरे पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कर खत्म हो जाएगा. विदेश मंत्रालय ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि भारत का उद्देश्य अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ शुरू करना नहीं है. भारत ने मिशन शक्ति को अपनी सुरक्षा और तकनीकी क्षमता से जुड़ा कदम बताया था.

क्या अमेरिका भारत पर नजर रख रहा था?

ग्रुश के बयान से यह सवाल भी उठता है कि अमेरिका को भारत के मिसाइल परीक्षण के बारे में कितनी जानकारी थी. उनके अनुसार, अमेरिका को मिसाइल परीक्षण की जानकारी थी, लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि इसका इस्तेमाल किसी उपग्रह को नष्ट करने के लिए किया जाएगा. यह बात 2019 में अमेरिकी रक्षा विभाग के तत्कालीन प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल डेविड डब्ल्यू. ईस्टबर्न के बयान से अलग नजर आती है. उन्होंने उन रिपोर्टों को खारिज किया था, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ने भारत के परीक्षण पर नजर रखने के लिए डिएगो गार्सिया से कोई टोही विमान भेजा था. ईस्टबर्न ने उस समय कहा था कि भारत की जासूसी के लिए अमेरिका ने कोई संपत्ति तैनात नहीं की थी.

डिएगो गार्सिया से निकला था अमेरिकी विमान?

सैन्य विमानों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली वेबसाइट Aircraft Spots ने दावा किया था कि अमेरिकी वायुसेना का एक विमान डिएगो गार्सिया से बंगाल की खाड़ी में एक मिशन के लिए रवाना हुआ था. इस गतिविधि को कुछ विशेषज्ञों ने भारत के मिसाइल परीक्षण पर निगरानी रखने की संभावित कोशिश के तौर पर देखा था. हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने उस समय भारत की जासूसी किए जाने की बात से इनकार किया था.

इस तरह 2019 का मिशन शक्ति परीक्षण सिर्फ भारत की एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इससे यह भी सामने आया कि भारत ने अपने कार्यक्रम की वास्तविक प्रकृति को काफी हद तक गोपनीय रखा था. डेविड ग्रुश का हालिया दावा बताता है कि परीक्षण सामने आने के बाद अमेरिकी खुफिया तंत्र को तत्काल अपने उपग्रहों की सुरक्षा और अंतरिक्ष में मलबे के संभावित खतरे का आकलन करना पड़ा था.

यह भी पढ़ेंः अभिजीत दीपके ने सहयोग के लिए मुंबई पुलिस को कहा थैंक्यू, 'दिल्ली पुलिस कुछ...'

समाचार स्रोत

यह खबर abp news world से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

मूल स्रोत देखें ↗